सनातन धर्म में Yogini Ekadashi का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस Yogini Ekadashi का व्रत करने और इसकी पवित्र कथा का श्रवण करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह कथा हमें केवल भक्ति का ही नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहने का भी संदेश देती है।

Yogini Ekadashi व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में अलकापुरी नामक दिव्य नगरी में धन के देवता कुबेर का राज्य था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा किया करते थे। भगवान शिव की पूजा के लिए प्रतिदिन ताजे और सुगंधित पुष्प लाने का दायित्व हेममाली नामक एक यक्ष को सौंपा गया था।
हेममाली का कार्य था कि वह प्रतिदिन मानसरोवर से सुंदर पुष्प लाकर समय पर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रस्तुत करे। वह अपने कार्य में निपुण था, लेकिन अपनी पत्नी विशालाक्षी के प्रति उसका अत्यधिक प्रेम एक दिन उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल बन गया।
एक दिन हेममाली अपनी पत्नी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि वह भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर फूल लाना ही भूल गया। पूजा का समय निकल गया, लेकिन फूल नहीं पहुंचे। जब कुबेर को इस बात का पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे।

उन्होंने तुरंत हेममाली को अपने सामने बुलाया और कहा, “तुमने अपने कर्तव्य की उपेक्षा करके भगवान शिव की पूजा में बाधा डाली है। यह बहुत बड़ा अपराध है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरोगे और लंबे समय तक दुख भोगोगे।”
कुबेर का श्राप मिलते ही हेममाली का सुंदर शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया। वह स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा और जंगलों, पर्वतों तथा निर्जन स्थानों में भटकने लगा। उसका जीवन अत्यंत कष्टदायक हो गया। न उसके पास भोजन था, न आश्रय और न ही कोई अपना।

लंबे समय तक दुख सहने के बाद एक दिन उसकी भेंट महान तपस्वी महर्षि मार्कंडेय से हुई। महर्षि ने अपनी दिव्य दृष्टि से उसके दुख का कारण जान लिया और उससे पूरी बात पूछी।
हेममाली ने हाथ जोड़कर अपने अपराध को स्वीकार किया और महर्षि से प्रार्थना की कि वे उसे इस भयंकर श्राप से मुक्ति पाने का कोई उपाय बताएं।
महर्षि मार्कंडेय ने कहा, “यदि तुम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की Yogini Ekadashi का व्रत पूरी श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ करोगे तथा भगवान विष्णु की आराधना करोगे, तो तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और तुम इस श्राप से मुक्त हो जाओगे।”
हेममाली ने महर्षि की आज्ञा का पालन किया। Yogini Ekadashi के दिन उसने उपवास रखा, भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की, उनके मंत्रों का जाप किया और पूरे मन से उनकी भक्ति की।

व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु उस पर प्रसन्न हुए। धीरे-धीरे उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया और उसका शरीर पहले की तरह स्वस्थ, सुंदर और तेजस्वी हो गया। श्राप से मुक्त होकर वह पुनः अपने दिव्य स्थान पर लौट गया और अपना जीवन धर्म तथा कर्तव्य के मार्ग पर चलाते हुए व्यतीत करने लगा।
Yogini Ekadashi कथा से मिलने वाली सीख
Yogini Ekadashi की यह पौराणिक कथा हमें सिखाती है कि जीवन में भक्ति के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना भी अत्यंत आवश्यक है। लापरवाही और कर्तव्य की उपेक्षा व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में डाल सकती है। वहीं, सच्चे मन से किया गया पश्चाताप, भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान बन सकता है।

धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति Yogini Ekadashi का व्रत करता है, भगवान विष्णु की पूजा करता है और श्रद्धापूर्वक इस कथा का श्रवण या पाठ करता है, उसके पापों का नाश होता है, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख, शांति, समृद्धि तथा भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
निष्कर्ष
Yogini Ekadashi की व्रत कथा केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणा भी है। हेममाली की कहानी यह बताती है कि मनुष्य से भूल हो सकती है, लेकिन सच्चे मन से भगवान की शरण में आने वाला व्यक्ति कभी निराश नहीं होता। भगवान विष्णु अपने भक्तों पर सदैव कृपा बरसाते हैं और उन्हें जीवन के हर संकट से बाहर निकालने का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए Yogini Ekadashi के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करें, भगवान विष्णु की आराधना करें और इस पवित्र कथा का अवश्य श्रवण या पाठ करें।